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उत्तर प्रदेश में 2002 के विधानसभा चुनाव चल रहे थे. सूबे के मुख्यमंत्री थे राजनाथ सिंह. भदोही की ज्ञानपुर सीट पर बीजेपी से मैदान में थे तत्कालीन विधायक गोरखनाथ पांडेय, उन्हें चुनौती दे रहे थे समाजवादी पार्टी के विजय मिश्रा. धांधली की शिकायतें आने पर चुनाव आयोग ने कुछ बूथों पर रीपोलिंग का फैसला किया. मतदान के दिन एक बूथ पर पहले दो गुटो में गर्मागर्मी हुई, अचानक गोलियां चलने लगीं. गोरखनाथ पांडेय के एक भाई रामेश्वर पांडेय की वहीं मौत हो गई जबकि दूसरे गंभीर रूप से घायल हो गए. गोलियों की तड़तड़ाहट से इलाके में सन्नाटा छा गया. गाड़ियों में खोजा जाने लगा कि गोरख कहां हैं लेकिन वह किसी और बूथ पर थे. सूचना मिलने पर जब वह वहां पहुंचे तो एक भाई खत्म हो चुका था. दूसरे को लेकर बनारस भागे. दिनदहाड़े हुई यह घटना जंगल में आग की तरह फैली. दुकानों के शटर गिरने लगे. सड़कें जाम कर दी गईं. गाड़ियां फूंकी जाने लगीं. दुकानें बंद होने लगीं. मामला सिटिंग MLA के भाइयों का था इसलिए सरकार भी एक्शन में आ गई. आरोप लगा कि विजय मिश्रा ने खुद अपने साथियों के साथ मिलकर इस घटना को अंजाम दिया. विजय मिश्रा चुनाव जीत गए. गोरखनाथ पांडेय बाद में BSP से सांसद चुने गए. लेकिन इस जीत ने विजय मिश्रा जैसै माफिया को राजनीति में स्थापित कर दिया.

By: अमित कुमार राय
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चुनाव टालने के लिए विजय मिश्रा ने खेला खूनी खेल’: गोरखनाथ पांडेय

गोरखनाथ पांडेय कहते हैं कि ‘विजय मिश्रा ने खुद उनके भाई रामेश्वर पांडेय की जान ली, उसे लग रहा था कि वह चुनाव हार रहा है. ऐसे में अगर वह मेरी हत्या कर देता तो चुनाव टल जाता, मेरा भाग्य या दुर्भाग्य जो भी कहिए मैं दूसरे बूथ पर था. मेरी गाड़ी में मेरे भाई थे. दिन में हुए इस मर्डर में मेरे दूसरे भाई गवाह हैं लेकिन कोर्ट ने विजय को बरी कर दिया. अब केंद्र, राज्य और मानवाधिकार आयोग की पहल पर वह मामला फिर खुला है. इस केस में उसे सजा होकर रहेगी’. 2002 के चुनाव में विजय मिश्रा तकरीबन 2000 वोटों से चुनाव जीतकर माननीय हो गए. फिर तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.


विजय मिश्रा की खासियतें जिसकी दिवानी है पब्लिक

इलाके के लोग बताते हैं कि विजय मिश्रा अमूमन किसी का नंबर सेव नहीं करते. तकरीबन 1500 लोगों के नंबर उन्हें जुबानी याद हैं. सीधा फोन लगाते हैं और बोलते हैं हां 'सर्वेश, मिथिलेष, दिनेश, महेश... बताएं'. नंबर देखकर ही पहचान लेते हैं किसका फोन है. दो लोगों में समझौता कराना उनका प्रिय शगल है, अगर झगड़ा जमीन का हो तो क्या कहने. दूसरा. मेहमानवाजी में विजय मिश्रा का कोई मुकाबला नहीं है. पत्रकार वार्ता बुलाते तो गुच्छी की सब्जी बनवाते. उसके बारे में बताते कि यह 50,000 रुपये किलो मिलती है. यह सब्जी या तो खुद बनाते या उनकी पत्नी रामलली देवी. कोई पत्रकार अगर उस भोज में शामिल नहीं हो पाता तो विजय मिश्रा फोन करके कहते कि 'ए फलाना गुच्छी की सब्जी बनउले रहलीं, अइला ना डांड़ लगी'. पत्रकारों को हर तरह से साधने का हुनर जानते. तीसरा-देवी भक्ति, नवरात्र के दिनों में व्रत रखते. काशी के 11 पंडित लगातार जप करते, समापन के दिन इलाके के कम से कम 40000 लोगों को भोजन कराते. पंडितों को भरपूर दक्षिणा और एक गाय देते. बाद में चुनाव जीतने के लिए यज्ञ कराने लगे. जैसे-जैसे यज्ञ का धुआं इलाके में फैलता विजय मिश्रा की जीत पक्की होती जाती. उनको करीब से जानने वाले बताते हैं कई बार गाड़ियों के काफिले के साथ निकल रहे विजय मिश्रा अचानक रास्ता बदल देते. साथियों से कहते कि देवी मां ने बताया है कि आज यहां पर हमला होने वाला है. एक दो बार ऐसी बातें सच भी हुईं हैं. इसे संयोग माना जाए या कुछ और लेकिन इससे विजय मिश्रा के उपासक की छवि और मजबूत होती गई.

 

भदोही के पास एक जगह है सीतामढ़ी. मिथक है कि माता सीता यहीं धरती में समाहित हुई थीं. विजय मिश्रा ने सीतामढ़ी को सीढ़ी बना लिया. नेता यहां दर्शन करने आते और विजय मिश्रा उन्हें खाने पर बुला लेते. उनके लिए भी गुच्छी की सब्जी बनाते. समाजवादी पार्टी के कई नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वह टिफिन में करके गुच्छी की सब्जी लखनऊ भी ले जाते. नेताओं को फूलों की माला पहनाने से पहले सोने की चेन पहनाना पसंद करते और उसका डिब्बा उनकी पाकेट में डाल देते. चेन का वजन नेताओं की हैसियत से तय होता. मुलायम की उनपर नजर पड़ी लेकिन बाद में शिवपाल के खासमखास हो गए. अपनी बैठकों में विजय मिश्रा कहते कि राहत तो एसएचओ देगा. एसपी जबतक फोन करेंगे, दरोगा काम कर चुके होंगे. इसलिए नीचे के लेवल पर अपने लोगों का होना जरूरी है. सिपाही से लेकर एसएचओ तक ब्राह्मण अधिकारी रखने के लिए संघर्ष करते.  


ठाकुर बनाम ब्राह्मण की लड़ाई में माफिया बन गया नेता

ब्राह्मण बहुल इलाके भदोही में कालीन की 'खेती' होती है. यहां बाहर से पैसा तब आने लगा था जब आमलोगों के पास खाने के पैसे नहीं होते थे. एक तरफ बनारस, दूसरी तरफ मिर्जापुर, इलाहाबाद के रास्ते में पड़ने वाला जिला भदोही लो प्रोफाइल माना जाता था. रोजगार के कोई खास साधन नहीं थे. बालू, खनिज, सड़कों और शराब के ठेके उसको ही मिलते जिसकी भुजाओं में दम होता. भदोही से 200 किमी दूर गोरखपुर के चिल्लूपार से 1985 में हरिशंकर तिवारी निर्दल विधायक चुने जा चुके थे. 90 के दशक में मुख्तार और बृजेश सिंह आमने-सामने आ गए थे. गैंग अलग-अलग थे लेकिन बनारस तक गैंगवार की खबरें चलती रहती थीं. उसके छींटे कभी-कभी भदोही पर भी पड़ते. क्योंकि यहां उदय हो चुका था विजय मिश्रा का जिन्हें कुछ ब्राह्मणों ने एक ठाकुर का मुकाबला करने के लिए इलाहाबाद के हंडिया से बुलाया था. चाहे गोरखपुर हो, गाजीपुर या बनारस केंद्र में ठाकुर होते. गोरखपुर और आसपास के जिलों में तो कॉलेज की राजनीति तक में ठाकुर-ब्राह्मण होने लगा था.

 

ज्ञानपुर का एक ब्लॉक है ‘डीघ’. 80 के दशक में वहां ब्लॉक प्रमुख का चुनाव हो रहा था. उम्मीदवार थे बाहुबली उदयभान सिंह उर्फ डॉक्टर सिंह के खास अभयराज सिंह, उनको चुनौती दे रहे थे एक चौबे जी. अभयराज सिंह 2 वोटों से चुनाव जीत गए. इसके बाद वहां ब्राह्मणों के खिलाफ गंदे-गंदे नारे लगाए जाने लगे. ब्राह्मणों ने इसे दिल पर ले लिया. कुछ खास लोगों की पंचायत बैठी. यह तय किया गया कि अगर ठाकुरों का मुकाबला करना है तो किसी ब्राह्मण को आगे किया जाए.


कालीन व्यवसायी के यहां वसूली के काम से निकला रास्ता

जिला प्रयागराज तब इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था. इसकी एक कोतवाली है हंडिया. इसका एक गांव है खपटिया जहां के मूल निवासी हैं विजय मिश्रा. बचपन गरीबी में बीता, बुद्धि तीक्ष्ण थी लेकिन आर्थिक हैसियत ठीक नहीं थी, हालात ऐसे बने कि मांगने से ज्यादा छीनने में मजा आने लगा. दबंगई और शातिरपन सीढ़ी बनने लगा. इनके बड़े भाई लाल साहब बहुत पहले ब्लॉक प्रमुख चुन लिए गए थे. विजय मिश्रा ने हसरतें हमेशा बड़ी पालीं. संभावनाओं की तलाश में उन्होंने हड़िया छोड़ दिया और 80 के दशक में भदोही चले आए. कद छोटा था लेकिन काठी अच्छी रही ...और बात का तो जवाब ही नहीं. भदोही के एक कालीन निर्यातक के यहां उन्होंने नौकरी कर ली. काम मिला बकाया वसूल करने का. विजय मिश्रा देनदार को ऐसे हैंडल करते कि पैसे अपने आप आ जाते. यही कला बाद में उनके काम आई.

 

कुछ लोग कहते हैं फंसे पैसे निकालने के लिए उनके हुनर का इस्तेमाल होने लगा. इसमें उन्हें अच्छा कमीशन मिलने लगा. जिस कालीन निर्माता के लिए काम करते उसे 'अब्बू' कहते. अब्बू राजनीति में नहीं थे लेकिन नेताओं को साधकर रखते क्योंकि लाइसेंस राज में बिना उनको साधे काम चल ही नहीं सकता था. कहा जाता है कि यहीं से विजय मिश्रा ने ठान लिया कि उन्हें भी नेता बनना है. दूसरी ओर उदयभान सिंह ऊर्फ डॉक्टर का मुकाबला करने के लिए एक दंबग ब्राह्मण की जरूरत थी. कुछ लोगों की विजय मिश्रा की नजर थी और विजय को अवसर की तलाश. हाथ कंगन को आरसी क्या. कहा जाता है कि विजय मिश्रा ने ब्राह्मण नेताओं के सामने दावा किया कि अगर सबका साथ मिले तो उदयभान, अभयराज क्या इलाके में किसी ठाकुर को नहीं पनपने देंगे, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े. लेकिन बसपा सरकार में मंत्री रहे रंगनाथ मिश्रा के बड़े भाई डॉक्टर धरणीधर मिश्रा की 1980 में हुई हत्या में विजय मिश्रा का नाम आ चुका था. मिर्जापुर में बुरके के भेष में पहुंचे बदमाशों ने उनकी जान ले ली थी. यह घटना विजय मिश्रा के खिलाफ जा रही थी लेकिन विजय मिश्रा ने इसे दूसरा रंग दे दिया.

 

एक समुदाय का साथ मिलने के बाद विजय मिश्रा ने शातिराना अंदाज में प्लानिंग की, तब बनारस में कांग्रेस के तपे तपाए नेता होते थे कमलापति त्रिपाठी, कांग्रेस की सरकारों में केंद्र से लेकर राज्य तक उनकी तूती बोलती थी. विजय मिश्रा ने उनके पैर पकड़ लिए. कमला बाबा को उन्होंने बताया कि उनका छोटा-मोटा बिजनेस है, एक पेट्रोल पंप हैं, कुछ ट्रक हैं लेकिन ठाकुर गुंडई करते हैं. उन्हें परेशान करते हैं. कमला बाबा अपराधियों से दूर रहते थे लेकिन ब्राह्मणों के प्रति दिल के कोने में जगह फिक्स थी. हरिशंकर तिवारी को वह आशीर्वाद दे चुके थे. विजय मिश्रा के सर पर भी हाथ रख दिया. अगली बार विजय मिश्रा कांग्रेस के दम पर ‘डीघ’ के ब्लॉक प्रमुख चुन लिए गए. फिर तो सिलसिला चल पड़ा, जिला पंचायत सदस्य हुए, पत्नी को जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाया.


डॉक्टर सिंह के किनारे लगते ही साफ हो गया रास्ता

ब्लॉक प्रमुखी चल पड़ी थी, धंधा फैल रहा था. हरिशंकर तिवारी गोरखपुर में तब 'हाता' बना चुके थे. गाजीपुर के मुहम्मदाबाद में मुख्तार का घर ‘बड़का फाटक’ या ‘फाटक’ के नाम से फेमस हो चुका था. विजय मिश्रा ने भदोही के धानापुर में एक किले जैसा घर बनाया. अब निशाने पर उदयभान सिंह उर्फ डॉक्टर थे. दोनों के इलाके बंटे हुए थे. लेकिन 1999 में जिला परिषद का ठेका लेने के लिए ज्ञानपुर में वकील शुक्ला समेत 3 लोगों की एक ही दिन हत्या कर दी गई. आरोप उदभान सिंह पर लगा. यह हत्याकांड विजय मिश्रा के लिए वरदान बन गया क्योंकि हत्या ब्राह्मणों की हुई थी. कहा जाता है कि विजय मिश्रा की घेरेबंदी, पैरवी और पैरोकारी से ही भदोही के पूर्व विधायक उदयभान सिंह उर्फ डॉक्टर सिंह मुकदमों में उलझ गए. बाद में उन्हें आजीवन कारावास की सजा हो गई और विजय मिश्रा का रास्ता साफ हो गया.  

 

विजय मिश्रा पर भी मुकदमे दायर होते जा रहे थे लेकिन इसके साथ ही उनका कद बढ़ता जा रहा था. ब्राह्मण बहुल इलाके की जनता उनकी मुरीद हो चुकी थी. देवी उपासना चल रही थी और मीडिया मैनेज थी. 1985 में जेल से निर्दल विधायक बनकर हरिशंकर तिवारी ने अपराध के राजनीतिकरण की नींव रख दी थी. हरिशंकर तिवारी ने अपने को गोरखपुर,  महाराजगंज,  देवरिया,  पडरौना और लखनऊ से गोरखपुर जाने वाले रेलवे ट्रैक पर फोकस कर लिया था. गाजीपुर में मुख्तार पनप रहे थे. बृजेश सिंह और सुभाष ठाकुर बनारस के इर्द-गिर्द के इलाकों में अपना असर रखते थे. ऐसे में लो प्रोफाइल भदोही में स्पेस खाली था. विजय मिश्रा ने इसे पकड़ लिया था. उन्होंने भदोही, मिर्जापुर, इलाहाबाद से लगते इलाकों पर फोकस किया.


मुख्तार के बिना अधूरी है कहानी

1997 में विहिप के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और बड़े कोयला व्यापारी नंद किशोर रूंगटा का बनारस से अपहरण कर लिया गया. 2 करोड़ की फिरौती मांगी गई. आरोप मुख्तार पर लगा. कहा गया ‘सामान’ भदोही में रखा गया. बाद में रुंगटा की हत्या करके शव को इलाहाबाद के झूंसी में फेंक दिया गया. इस केस में मुख्तार अंसारी और विजय मिश्रा दोनों को नामजद किया गया लेकिन सीबीआई कोर्ट ने दोनों के खिलाफ सबूत को पर्याप्त नहीं माना. कहा जाता है कि जरूरत पड़ने पर विजय मिश्रा ने हर माफिया की मदद ली लेकिन बाद में अपना रास्ता खुद बनाया. धंधे में किसी को आड़े नहीं आने दिया. संदेश साफ था या हिस्सेदारी या तो रंगदारी, चुनाव सामने वाले को करना था. वकीलों से लेकर अफसरों तक, एसएचओ से लेकर एसपी तक को विजय मिश्रा ने साध लिया था. खनन के ठेकों पर विजय मिश्रा का एकछत्र राज्य रहा. 20 किमी के दायरे में तो कई वर्षों तक बालू के ठेके उठे ही नहीं. बालू से लदे जो ट्रक-ट्रैक्टर निकलते उनसे टोल लेने की हिम्मत तक कोई नहीं करता.


जब मुलायम हेलिकॉप्टर में लेकर उड़ गए

पैसे और प्रभाव के बल पर विजय मिश्रा मुलायम सिंह के दरबार तक पहुंचने में सफल रहे. समाजवादी पार्टी में शामिल होने की कहानी भी एक संयोग ही काम आया. 2000 के आसपास विजय मिश्रा अपने उफान पर थे. शिवकरण यादव ‘काके’ उस समय जिला पंचायत अध्यक्ष हुआ करते थे. उन्होंने नेताजी को अपशब्द कह दिया था. कुछ लोग कहते हैं कि विजय मिश्रा ने वादा किया कि अगर नेताजी का आशीर्वाद मिल जाए तो वह काके को कहीं का नहीं छोड़ेंगे. हालांकि विजय मिश्रा कई जगह दावा कर चुके हैं कि नेताजी ने उन्हें बुलाकर काके की राजनीति समाप्त कराने में मदद मांगी थी. खैर विजय मिश्रा को जिला पंचायत के 3 टिकट मिले और तीनों पर उनके उम्मीदवार जीत गए. मुलायम ने प्रतिभा पहचान ली. 2002 के चुनाव में ज्ञानपुर से इस शर्त पर टिकट मिला कि वह भदोही, मिर्जापुर के सपा उम्मीदवारों को भी जिताएंगे, ऐसा हुआ भी.

 

2005 में विजय मिश्रा की पत्नी रामलली जिला पंचायत अध्यक्ष हो गईं. 2007 में विजय मिश्रा को फिर सपा से टिकट मिला और वह फिर विधायक बन गए. लेकिन सरकार मायावती की बनी. 2009 में ज्ञानपुर से सटी विधानसभा भदोही में उपचुनाव था. ठंड का मौसम था लेकिन यहां सियासी पारा गर्म था. मायावती को खास अफसरों ने बता दिया था कि अगर विजय मिश्रा चाहें तो बीएसपी जीत सकती है. अफसरों ने फाइलें भी खोल ली थीं. संदेश साफ था या तो समर्थन या गिरफ्तारी. विजय मिश्रा तक संदेश पहुंचा दिया गया कि बहनजी चाहती हैं कि विजय बीएसपी का समर्थन करें. विजय मिश्रा ने ना कर दिया और भूमिगत हो गए. उसी दौरान मुलायम सिंह सपा के प्रत्याशी के प्रचार के लिए पहुंचे. विजय मिश्रा अचानक प्रकट हुए और मुलायम सिंह से कहा कि ‘इस जनसभा के बाद मुझे गिरफ्तार कर लिया जाएगा’. मुलायम दहाड़ने लगे कि किसके माई के लाल में हिम्मत है कि उनके विधायक को गिरफ्तार करे. वह अपने हेलिकॉप्टर में विजय मिश्रा को बैठाकर उड़ लिए. कहा जाता है कि तब तो मुलायम सिंह ने उन्हें बचा लिया लेकिन विजय मिश्रा पर साढ़ेसाती शुरू हो गई. उन्होंने इलाका क्या छोड़ा, परिंदों के भी पर निकल आए. उन पर मुकदमें लदने लगे. 


‘हेलो मैं विजय मिश्रा बोल रहा हूं’

विजय मिश्रा ने इलाहाबाद में एक महल बनाया, जब पहुंचते तो दरबार लगने लगता. उनको करीब से जानने वाले बताते हैं कि कम से कम 4 घंटे फोन पर रहते. 'हेलो मैं विजय मिश्रा बोल रहा हूं' यह आवाज सुनते ही अधिकारियों से लेकर आम लोगों में सिहरन दौड़ जाती. फोन पर ही बात होती और फैसला हो जाता. झगड़े अमूमन जमीन के होते, बंटवारे के होते, शादी करके किसी ने लड़की छोड़ दी है. किसी ने शादी में ज्यादा दहेज की शर्त रखी होती. ऐसे मामलों का निपटारा ऑन स्पॉट हो जाता. उस फरमान को लागू कराने में पूरा अमला लग जाता. जब तक विजय मिश्रा की चली उनके मनपसंद अधिकारी ही जिले में टिक पाए. ऐसे में फैसलों को लागू कराने में कोई दिक्कत नहीं आई. अगर कोई बागी हो जाता तो उसे अलग तरीके से समझा दिया जाता जो दूसरों के लिए नजीर बन जाता.


सिपाही का मर्डर और नंदी पर हमला

2009-11 तक पूर्व सांसंद गोरखनाथ पांडेय के भाई की हत्या का मामला हाई कोर्ट में अंजाम पर पहुंचने वाला था. लेकिन विजय का दबदबा इतना बढ़ गया था कि गोरखनाथ पांडेय के घर का कोई इलाहाबाद जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. मुकदमे की पैरवी कर रहे थे गोरखनाथ पांडेय के रिश्तेदार सूर्यमणि मिश्रा जो इलाहाबाद आईजी ऑफिस में पेशकार थे. 2011 में इलाहाबाद के सिविल लाइंस में उनकी हत्या कर दी गई. आरोप विजय मिश्रा पर लगा. बसपा सरकार में मंत्री थे नंद गोपाल गुप्ता नंदी. अब बीजेपी सरकार में भी मंत्री हैं. इलाहाबाद नंदी की कर्मस्थली रही और इलाहाबाद के अल्लापुर में ही विजय मिश्र ने अपनी हवेली बनवाई थी. जहां गाड़ियों के काफिले और बंदूकों के साए में मिश्रा का आना जाना होता था. नंदी भी बिजनेसमैन रहे हैं, मिश्रा अपने आपको इलाहाबाद में फिक्स करना चाहते थे. बालू खनन से आगे बढ़कर उन्होंने रेलवे के ठेकों में भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया था. बताते हैं कि किसी बात पर विजय मिश्रा और नंदी में ठन गई. 2010 में जिस दौरान विजय मिश्रा भूमिगत थे. उसी दौरान कैबिनेट मंत्री रहते हुए नंद गोपाल नंदी पर इलाहाबाद में हमला हो गया. आरडीएक्स बम एक स्कूटी में रखा हुआ था. नंदी जैसे ही मंदिर के लिए निकले रिमोट से ब्लास्ट कर दिया गया. नंदी महीनों एडमिट रहे. इस हमले इंडियन एक्सप्रेस के एक पत्रकार और नंदी के एक सुरक्षा गार्ड की मौत हो गई.

हमले में विजय मिश्रा का नाम आया. इसमें राजेश पायलट नाम के एक गुमनाम अपराधी की इस्तेमाल किया गया था. विदेश भागने की फिराक में राजेश को एसटीएफ ने मुंबई से गिरफ्तार किया था. बाद में बुलंदशहर जेल में उसकी मौत हो गई. विजय मिश्रा कमजोर पड़े तो नंदी ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया एक सिलसिलेवार ट्वीट कर नंदी ने पूछा था कि जिस पर 73 मामले दर्ज हों जिसने मुझपर जानलेवा हमला कराया हो. जिसने पूर्व मंत्री राकेश धर त्रिपाठी के भाई की हत्या कराई हो. जिसने पूर्व सांसद गोरखनाथ पांडेय के भाई की हत्या कराई हो. उसे अपराधी नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे???


जेल फिर विजय यात्रा... पार्टी से बाहर

बसपा सरकार विजय मिश्रा के पीछे पड़ी थी. राजेश पायलट गिरफ्तार हो चुका था. ऐसे में विजय मिश्रा को अपने एनकाउंटर का डर सताने लगा था. पार्टी की तरफ से भी दबाव था कि अपने को कोर्ट में निर्दोष साबित करें. कहा जाता है कि मुलायम सिंह ने साफ कहलवा दिया था कि भागने का मतलब खुद को दोषी मानना है. 2012 के चुनाव आने वाले थे. विजय मिश्रा ने 2011 में दिल्ली के हौज खास में दाढ़ी बढ़ाए हुए समर्पण कर दिया और जेल चले गए. लेकिन मुलायम सिंह का भरोसा कायम रहा. 2012 में विजय मिश्रा को फिर सपा का टिकट मिल गया और वह जेल से ही विधायक चुन लिए गए.

 

सरकार अपनी आ चुकी थी. अगस्त 2012 में विजय मिश्रा को जमानत मिल गई. बताते हैं कि उन्हें लेने के लिए हजारों गाड़ियों का काफिला नैनी पहुंचा था. पुलिसवाले बख्शीश मांग रहे थे और नोटों की गड्डियां लुटाई जा रही थीं. विजय मिश्रा को फूल मालाओं से लाद दिया गया था. अब विजय मिश्रा को रोकने वाला कोई नहीं था. 2014 तक सब ठीक ठाक चलता रहा. 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने विजय मिश्रा की बेटी सीमा मिश्रा को टिकट भी दिया और वह मोदी लहर के बावजूद 2 लाख वोट पाने में सफल रहीं.

 

लेकिन विजय मिश्रा की आकांक्षाएं बढ़ती जा रही थीं. बनारस से लेकर इलाहाबाद तक अपना एकछत्र राज्य चलाना चाह रहे थे. सूबे के मुखिया अखिलेश पर आरोप लग रहे थे कि समाजवादी सरकारों में माफिया बेलगाम हो जाते हैं. मुख्तार का विरोध चरम पर था. बीजेपी इसे मुद्दा बनाए हुए थी. बीएसपी के पूर्व सांसद और बीजेपी में आ चुके गोरखनाथ पांडे ने अखिलेश यादव को बता दिया था कि ज्ञानपुर का विधायक विजय मिश्रा उनके भाई का हत्यारा है और शिवपाल जी का खास है. अखिलेश तक यह बात भी पहुंचा दी गई कि विजय मिश्रा मुख्तार के खास रणनीतिकार के तौर पर काम करते हैं. अखिलेश के लिए यह काफी था. मुलायम कमजोर पड़ चुके थे या कमजोर कर दिए गए थे. 2017 के चुनाव में सपा ने विजय मिश्रा का टिकट काट दिया. विजय मिश्रा कहां मानने वाले थे. उन्होंने निषाद पार्टी से टिकट ले लिया और फिर विधायक बन गए.

 

विजय मिश्रा विधायक तो बन गए लेकिन योगी की सरकार आते ही मुश्किलों का दौर शुरू हो गया. मिश्रा की घेरेबंदी होने लगी. जिन जातीय पुलिसवालों और अफसरों के बल पर उनका सिक्का चलता था उनकी जगह दूसरे आ गए. विजय मिश्रा की छटपटाहट बढ़ती जा रही थी लेकिन बेबस थे लखनऊ में कोई ऐसा सेट नहीं हो पाया जो मदद करे. ऐसे में गड़े मुर्दे उखड़ने लगे. उनके एक रिश्तेदार ने ही विजय मिश्रा, उनकी पत्नी रामलली देवी और बेटे विष्णु मिश्रा पर मकान कब्जा करने का आरोप लगाते हुआ गोपीगंज थाने में केस दर्ज करा दिया.


गायिका ने लगाया गैंगरेप का आरोप

एक गायिका ने विजय मिश्रा, भतीजे मनीष मिश्रा और बेटे विष्णु मिश्रा पर गैंगरेप का केस दर्ज करा दिया. आरोप लगाया कि जब 2014 के लोकसभा चुनाव में वह सीमा मिश्रा के प्रचार में आई थी तो उसे विजय मिश्रा के घर बुलाया गया और तीनों ने उसके साथ रेप किया. एक वीडियो कॉल का स्क्रीनशॉट भी वायरल किया गया जिससे काफी छीछालेदर हुई. विजय मिश्रा एक बार फिर भूमिगत हो गए. विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद उन्हें खुद के एनकाउंटर का डर सताने लगा. संयोग कहिए या सियासत का खेल मार्च 2021 में विजय मिश्रा को भी मध्य प्रदेश से ही गिरफ्तार किया गया. उनकी बेटियों ने संदेह जताया और गुहार लगाई कि पुलिस उन्हें यूपी में ले आए लेकिन गाड़ी पलटनी नहीं चाहिए. यूपी के पूर्वमंत्री रंगनाथ मिश्र कहते हैं ‘जिस पर 73 मामले दर्ज हों, जिसने 14 मर्डर किए हों जिसमें 10 ब्राह्मण हों वह किस मुंह से कह सकता है कि वह ब्राह्मण है इसलिए उस पर अत्याचार हो रहा है. विजय मिश्रा दुर्दांत अपराधी है और अपराधियों की कोई जाति नहीं होती’.


ध्वस्त हो चुका है किला

विजय मिश्रा इस समय आगरा के सेंट्रल जेल में बंद हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है. निषाद पार्टी से निकाले जा चुके हैं. सपा ने पहले ही निकाल दिया था. बीजेपी में दाल गलने वाली नहीं है. योगी की नजर अवैध संपत्तियों पर पड़ चुकी है, प्रयागराज का किला ध्वस्त कर दिया गया है. ज्ञानपुर थाने के पास कब्जाई गई जमीन को मुक्त कराकर उसे पुलिस को दिया जा चुका है. हथियारों के लाइसेंस रद्द किए जाए रहे हैं. अब यज्ञ का धुआं इलाकों तक नहीं पहुंच पा रहा. तिलस्म टूट चुका है. नेता पर अपराधी की छवि भारी पड़ने लगी है. फिजा बदल चुकी है.

इस बार भी विजय मिश्रा जेल से चुनाव लड़ रहे हैं. आगरा जेल में बंद विधायक प्रगतिशील मानव समाज पार्टी से टिकट का जुगाड़ करने में सफल रहे. न भाजपा में दाल गली, न सपा ने पूछा. पिछली बार जिस पार्टी से विधायक चुने गए थे इस बार वह बीजेपी के साथ चुनाव लड़ रही है.